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» Mehangai Poems
Dhan Laxmi

प्रिय क्यूँ तुम नए-नए सूट सिलाती हो !
पुरानी साडी में भी तुम अप्सरा सी नजर आती हो !!!

इन ब्यूटी पार्लरों के चक्करों में ना पडा करो !
अपने चांद से चेहरे को क्रीम पाउडर से यूँ ना ढका करो !!

रेस्टोरेंट होटल के खाने में क्या रखा है !
तुम्हारे हाथों से बना घर का खाना, इनसे लाख गुना अच्छा है !!!

इन सैर सपाटों में वो बात कहाँ !
तुम्हारे मायके जैसा ऐशो-आराम कहाँ !!!

नौकरों से खिटपिट में, मत सेहत तुम अपनी खराब करो !
झाडू-पौछा लगा लगा हल्का सा व्यायाम करो !!!

सोने-चांदी में मिलती अब सो सो खोट है !
तुम्हारी सुन्दरता ही 24 कैरेट प्योर गोल्ड है !!!

माया-माया मत किया कर पगली, यह तो महा ठगिनी है !
मेरे इस घर-आंगन की तो, तू ही असली धन लक्ष्मी है !!

Submitted By: Deepak on 21 -Oct-2017 | View: 49

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