EverythingForCity.com  
Login Register
Login Register
Home | Entertainment | Our India | India Yellow Pages | Tools | Contact Us
Shayari | Quiz | SMS | Tongue Twister | Poem | Fact | Jokes
 
 
 
 
 
Home –› Entertainment –› Poem –›Save Trees Poem
» Save Trees Poem
Air Pollution

व्यथित हृदय से फिर लिख बैठा,
विकसित मानव की गाथा |
विकास की ऐसी दौड़ लगी है,
कुछ भी नही समझ आता |

धूल उड़ाती बड़ी गाड़ियाँ,
जीवन पथ पर चलती है |
कारखानो के धुवें से,
मानव उम्र सदा ही ढलती है |

रोग हज़ारों पाले बैठे,
इस सुखमय संसार में हम |
गुब्बार प्रदूषण का है ऐसा,
जीवन जीना हो गया कम |

साँसे नही आती हवा में,
हरे पेड़ जब कटते है |
गैस विषैली घर बनाए,
साँसों में फिर घुलती है |

वृक्षारोपण से अब अपना,
पर्यावरण बचना है |
प्रदूषण का भय जो ऐसा,
जड़ से हमे मिटाना है |

आओ आज शपथ ले ऐसी,
हरियाली फिर लाएँगे |
वसुंधरा पर स्वास्थ्य शक्ति का,
फिर आधार बनाएँगे |

Submitted By: Shiv Charan on 18 -Oct-2017 | View: 88

Help in transliteration

 
Related poem:
Browse Poem By Category
 
 
 
Menu Left corner bottom Menu right corner bottom
 
Menu Left corner Find us On Facebook Menu right corner
Menu Left corner bottom Menu right corner bottom